छतरपुर की सरहद से लगे पन्ना टाइगर रिजर्व बफर जोन में आने वाले दस गांव का हाल बेहाल।

केंद्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण कानून व वाइल्ड लाइफ सेंचुरी एक्ट के मुताबिक यहां विकास कार्य प्रतिबंधित कर रखें हैं।

वन्यजीव अभ्यारण्य की परिधि में कंक्रीट की सड़क आदि निर्माण पर बफर जोन में प्रतिबंध हैं।

केंद्र सरकार का केन- बेतवा नदी गठजोड़ प्रोजेक्ट इन्ही गांव में से एक ढौढन (गंगऊ बांध) डूबक्षेत्र में मुकम्मल होने की योजना हैं।

नैसर्गिक जंगल आबाद हुए फिर आदिवासी बसे और फिर विकास के पहरुआ आधुनिक जंगलों के खैरख्वाह वनविभाग का जन्म हुआ। वहीं आदिवासियों की जंगलों से आधिकारिक बेदखली शुरू होने लगी।

पन्ना टाइगर्स रिजर्व में जंगली वनस्पतियों और खाद्य पदार्थों, जलचर (मछली) आदि पर अब आदिवासियों का हक नहीं हैं।

केन नदी पर वर्षभर आश्रित रहने वाले यह मूल निवासी आदिवासी सरकारी उपेक्षा का शिकार हैं।

जंगलों से विस्थापित करके इन आदिवासियों को विकास के सब्जबाग शहरों में पलायन की शक्ल पर मौजूद है।

पन्ना टाइगर रिजर्व बफर क्षेत्र के दस गांवों में सड़क,बिजली, पानी,स्वास्थ्य सेवा,बच्चों की बुनयादी शिक्षा और राशनकार्ड योजना व प्रधानमंत्री आवास योजनाओं का लाभ सिफर हैं।

वर्ष 2010 में केंद्रीय जलसंसाधन मंत्रालय की जनसूचना मुताबिक यह गांव कागजों में विस्थापित किये जा चुके हैं लेकिन धरातल पर आज भी मौजूद है।

आदिवासियों की महिलाओं के हिस्से दिनभर नदी से पानी लाना और गृहस्थी के दैनिक कामकाज आते हैं। छद्म मर्द (पुरुष) या तो परदेस में कमाने चले गए या फिर खाली वक्त में चौपाल लगाकर तास के पत्ते खेलते है।

गांव की जर्जर पगडंडियों से गुजरकर केन नदी में पानी लेने जाना किसी नरखलोक से कमतर नहीं है खाशकर बारिश में और ज्यादा।

मासूम बच्चियों के साथ ग्रामीण औरतें गगरी की लंबी कतारों पर नदी तीरे देखना आजकल अतिश्योक्ति पूर्ण लगता हैं पर यही सच है।

गांव में पेयजलापूर्ति को कुएं और तालाब बने तो लेकिन सरकार की भ्रस्टाचारी व्यवस्था ने इन्हें रुपया हजम करने का साधन बना रखा है।

अशिक्षा के चलते यह आदिवासियों का क्षेत्र भारी गरीबी और पिछड़ेपन का चारागाह हैं।

केंद्र सरकार यूपी और मध्यप्रदेश सरकार के सहयोग से यहां पर्यावरण कानून व वन्यजीव अभ्यारण्य एक्ट से इतर जाकर ग्रेटर गंगऊ बांध बनाने की कवायद कर रही हैं।

इस योजना में आदिवासियों के पलायन के साथ बड़े स्तर पर 7 से 23 लाख पेड़ काटे जाएंगे लेकिन यथास्थिति का आंकलन असंभव हैं।

The lives of the tribals dependent on the Ken river are torture houses

 

 

 

 

 

 

छतरपुर/ बाँदा। मध्यप्रदेश के छतरपुर का बिजावर और किशनगढ़ क्षेत्र हराभरा इलाका हैं। गर्मी में बेहद गर्म और सर्दी में बहुत सर्दी यहां के पर्यावास की तासीर हैं। मध्यप्रदेश की मौरमयुक्त लाल मिट्टी में पानी छन्न से उड़ता है। मई और जून के महीनों में यदि लू के थपेड़े नहीं लगे तो चिलचिलाती धूप हरियाली के बरक्स गर्मी का अहसास अधिक कराती हैं। बावजूद इसके यह क्षेत्र यूपी बुंदेलखंड से अधिक वात्सल्य व सुकून भरा माहौल देता हैं। वर्ष 2009 के आसपास पहली बार यहां आए थे। उसके बाद से प्रकृति की आवाज गाहे बगाहे यहां खींच लेती हैं। इस मर्तबा जब बीते 15 जून को यहां जाना हुआ तो गंवई आदिवासियों को केन नदी में पानी के लिए जूझते देखा। गांव में भूगर्भ जल नीचे है इसलिए तालाब और कुओं में पानी नहीं हैं। वर्षा जल संग्रहण के लिए यहां की लाल मौरमयुक्त मिट्टी भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार हैं जिसमें पानी के अधिक ठहराव की संभावना कमतर हैं। मध्यप्रदेश बुंदेलखंड में ग्रेनाइट की प्लाइट वाला यह भौगोलिक क्षेत्र वनों से अभीतक कुछ बहुत परिपूर्ण हैं। बावजूद इसके यहां जलसंकट की भयावहता गांव में सहज देखने को मिलती हैं। छतरपुर के बाजना वनरेंज से निमानी और बिजावर के आसपास पेयजलापूर्ति की किल्लत हैं।

The lives of the tribals dependent on the Ken river are torture houses

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्यामरी और केन नदी के सहारे आदिवासी
पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र के बफर जोन में आने वाला यह इलाका ठेठ बुंदेली भाषा का धनी हैं। लोग स्वभाव से मददगार लेकिन कुछ स्वार्थ की चपेट में है। ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी और अन्य सभी बिरादरी के समाज वाले यहां श्यामरी व केन नदी पर निर्भर हैं। इस इलाके के रहवासियों से जब संवाद हुआ तो क्षेत्र में युवा सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर व बलवीर सिंह (सुकवाहा) का सहयोग मिला। इन्ही के कदम रस्ते हम उन गांव में पहुंचे जहां विकास ने आत्महत्या कर ली हैं। केन नदी पर अपनी दिनचर्या बतलाने वाले दर्जनों किसानों ने सरकार पर बड़े सवाल खड़े किए है।

The lives of the tribals dependent on the Ken river are torture houses

 

 

 

 

 

 

 

 

 

वहीं क्षेत्र के इन्ही गांव से ताल्लुक रखने वाले ग्राम सुकवाहा से किसान भगवान सिंह, करन सिंह,दरयार सिंह, संतोष कुडेरिया,रामसनेही नायक,अजय पाठक,रामचरन सौर,राजाराम पटेल,पुष्पेन्द्र सिंह, रामेश्वर यादव (सरपंच ),ग्राम ढोंडन मुन्ना यादव,प्रभु यादव,ग्राम पलकोंहा गांव के जमना ओमरे (सरपंच),जगन्नाथ यादव,संतोष यादव,छुट्टी यादव आदि की मानें तो यह नदी और जंगल ही हमारी रीढ़ हैं। हमने पुरखों की थाती और अपना बचपन दोनों जवान होते यहीं देखा हैं। ग्रामीण कहते है यहां माकूल सुविधा मयस्सर नहीं होने से आज ग्रामीण जंगल छोड़कर जाने की बात करने लगे है। यह जंगल की खुशनुमा ज़िन्दगी सरकारों ने बांध परियोजना के चलते यातनागृह में तब्दील कर दी है।

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सरकार चाहती है यह ग्रामीण थककर यहां से चले जाएं। जबकि केन नदी में साल के आठ माह इतना पानी नहीं रहता कि वह यूपी और एमपी क्षेत्र को सिंचाई व पेयजल उपलब्ध करा सके। बारिश काल को छोड़कर अन्य दिनों यहाँ पानी हमारे जीवन को चलाने जितना ही रहता हैं। रोजमर्रा की आवश्यकता इन्ही श्यामरी व केन नदियों से पूरी होती हैं। उधर सरकार तो बांध परियोजना से मगरमच्छों का प्रजजन केंद्र भी खत्म करने का मन बना चुकी हैं।

ये जंगल फिर आबाद नहीं होंगे
बांध परियोजना में 7 से 23 लाख अनुमानित बुजुर्ग पेड़ों के कटान पर सवाल किया तो आदिवासी कहते है सरकार कोई एक आदर्श मॉडल या ढांचा दिखलाए जहां उन्होंने नैसर्गिक विशाल जंगलों की कटाई के बाद ऐसे जंगल आबाद कर लिए हो ? सागौन, महुआ, बेलपत्र, आचार, जामुन, खैर, कहवा, शीशम, जंगल जलेबी, गुली, आँवला समेत अन्य प्रमुख प्रजातियों के बड़े पेड़ से वन्यजीव और हम दोनों पोषित होते है। देशभर में बड़े हाइवे, एक्सप्रेस-वे और खनन प्रोजेक्ट गवाह हैं कि उन्होंने कथित विकास की आड़ में सिर्फ नदी, जंगल और पहाड़ों की तबाही लिखी हैं। हम इन गांव से नहीं जाना चाहते लेकिन यदि सरकार मजबूर करेगी और नदी व जंगल पर आत्मनिर्भर हमारा जीवन यदि यूँ ही कष्टकारी बना रहेगा तो भला कौन यहां रहना चाहेगा ? छोटी बच्चियों की तालीम और महिलाओं का ब्याह,प्रजनन सुविधा दोनों उतनी ही दूभर लगती हैं जितनी यहां से बाहर जाकर रोजीरोटी कमाने की मशक्कत हैं। विडम्बना हैं कि इन आदिवासियों के सवालों का हमारे पास फिलहाल वक्त सार्थक उत्तर नहीं था।

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रिपोर्ट आशीष सागर दीक्षित

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