मौजूदा नगरपालिका अध्यक्ष से तालाब संरक्षण की उम्मीद नहीं तो पूर्व राजनीतिक दलों के नगरपालिका अध्यक्ष तालाब में किये लाखों रुपयों का बंदरबांट।

मुहल्ले के सीवर और नाबदान से जहरीला होता हैं तालाब का बरसाती पानी,प्राकृतिक जलस्रोत हो चुके बन्द।

शहर का प्रसिद्ध कजली मेला और रामलीला के लिए के ही चर्चित रहा तालाब आज कूड़ाघर और अवैध कब्जों की शरणस्थली।

बाँदा के मशहूर चोर आबिद बेग ने बनवाये थे इस छवि तालाब के घाट जो कालांतर में अग्रवाल परिवार के बुजुर्ग व्यक्ति छवि लाल अग्रवाल की स्मृति में छाबी तालाब नाम से जाना जाता है।

करीब 22 एकड़ से अधिक रकबा वाले इस छाबीतालाब के निकट बामदेवेश्वर पहाड़ ( शाब्दिक अपभ्रंश से अब हुआ बम्बेश्वर पहाड़) स्थित हैं। अतीत में इस पहाड़ का पानी और शहर के ढालान का जल तालाब का कैचमेंट एरिया पानी से लबालब रखता था।

तहसील के खसरा और खतौनी में अन्य तालाबों की तर्ज पर छाबी तालाब की हत्या भी बदरंग विकास व स्थानीय भूमाफिया की बदौलत सुनिश्चित हुई हैं।

सुंदर छवि थी तालाब की तो लोग कहने लगे छाबी तालाब,तालाब में चलती थी कभी नांव और लगता था बड़ा मेला।

इस तालाब की सुंदरता और ज़मीन को नगरपालिका के तत्कालीन अध्यक्ष व ठेकेदारों ने दफन कर दिया। मुहल्ले वाले खामोश क्योंकि अब हर घर मे हैंडपंप,पेयजलापूर्ति को पाइपलाइन व समरसेबल हैं। घरों का गटर,मुहल्ले के नाले तालाब के रस्ते केन नदी में जाते है।

भूजल दोहन व संरक्षण के सारे कानून, न्यायालय के आदेश स्थानीय बाँदा नगरपालिका व प्रशासनिक अमले ने तालाबों के संदर्भ में महज खानापूर्ति को फ़ाइल गार्ड में लगा रखे हैं तब कैसे बचें ये तालाब ?

बाँदा के छवी उर्फ छाबी तालाब के संरक्षण को बनी मुहल्ले के कुछ भामाशाह की समिति ने ही अधिकतर अवैध कब्जों पर चुप्पी साध ली हैं।

बाँदा के 11 बड़े तालाबों में सारे खत्म होने की कगार पर है मसलन प्रागी तालाब,कंधरदास तालाब,साहेब तालाब कम्पनी बाग स्टेडियम रोड,बाबू साहब तालाब,डिग्गी तालाब,लाल डिग्गी तालाब ( मंगलम मैरिज हाउस बन गया,रेलवे क्रासिंग कटरा मार्ग),परुशराम तालाब,सेढू तलैया आदि। वहीं जनपद के कस्बों के तालाब जैसे अतर्रा तहसील,भवानी पुरवा-बाबा तालाब,मवई का तालाब,गांव के तालाब आज कूड़ाघर व जहरीले पानी को ढोने वाले स्थान ही हैं।

तालाब को लेकर सत्ता में आई बीजेपी के घोषणा पत्र का मिशन तालाब विकास प्राधिकरण आज तक मुकम्मल नहीं हुआ। यह अलग बात है सरकार तालाब संरक्षण व निर्माण को सालाना लाखो रुपया गर्क करती है। प्रशासन खर्च करने का माध्यम हैं।

बाँदा शहर में स्थित छाबी तालाब पर आज एक सैकड़ा से अधिक मरी मछली सामने आई हैं। मिली जानकारी मुताबिक तालाब में सीवरेज पानी व बारिश के जल में प्रदूषण के संक्रमण होने से ऐसा हुआ है। स्थानीय बाशिंदों में कुछ सूत्रधार नाम नहीं लिखने की शर्त पर कहते है यह तालाब तो अब अवैध कब्जा का अड्डा हैं। हर पांच साल में नगरपालिका तालाब संरक्षण का झुनझुना बजाकर बजट हजम करती हैं।

वहीं शहर के तालाब पुरुषों ने कभी इन तालाबो की सुध नही ली हैं। राजस्व के ठेकेदारों ने लेखपाल के जरिये बाँदा के ज्यादातर तालाब बेच लिए या भूमाफिया को सौंपकर लोगों को बिकवा दिए है। गौरतलब हैं तालाबों को लेकर सुप्रीम कोर्ट से पारित आदेश हिंचलाल तिवारी बनाम कमलादेवी व अन्य सहित अन्य तमाम हाईकोर्ट के आदेशों को ज़िले के एसडीएम व डीएम ने बौना कर दिया है।

जबकभी किसी ने शिकायत की तो कार्यवाही के नाम पर वर्षों लंबित कार्यवाही से किसी तालाब भूमाफिया का कुछ नहीं बिगड़ता हैं। उल्टा शिकायतकर्ता निराश होकर रामभरोसे हिंदुस्तान वाली कहावत पर विश्वास करने लगता हैं। अलबत्ता बाँदा के छाबी तालाब में मछलियों की मौत कैसे हुई यह जांच का विषय है।

दिवंगत अनुपम मिश्र जी की किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ काश स्थानीय बाँदा वासी पढ़ते और कढ़ते तो यह तालाब जलराशियों का अदभुत उदाहरण बन सकते थे। उधर सरकार का दावा है वो तालाबों के भूमाफिया को नेस्तनाबूद करेगी तब जबकि माननीय ही माफियाओं के भाग्यविधाता बने हैं। खत्म होते तालाब पर पूरी पड़ताल जल्द ही वाइस आफ बुंदेलखंड पर पढ़ियेगा ज़रुर।

रिपोर्ट आशीष सागर दीक्षित

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