खदान संचालक कात्याना शर्मा / इंचार्ज नरेंद्र शर्मा व अन्य नहीं पहुंचे अस्पताल,बाँदा के नरैनी क्षेत्र का बाशिंदा हैं मृतक ओमप्रकाश।

खदान में पोकलैंड चलाना सीख रहा था। पोकलैंड की लर्निंग में जीवनलीला हुई समाप्त।

बाँदा में सिलसिलेवार मौरम खदानों में हो रही मौत। बीते 11 जून पैलानी के अमलोर खंड 7 में मारा / मरा था खदान कैंची कर्मी बरेहटा निवासी रामलखन निषाद। इसके पूर्व पैलानी में मरे तीन मजदूर।

मजदूरों की मौतों पर नहीं होती कार्यवाही, गांव के प्रधान,दबंग और अफसरशाही मिलकर पीड़ितों से करवाती समझौता। यही महोबा के पहाड़ खदानों में होता हैं।

गरीबी और बेरोजगारी के चलते गरीब करता मौत के मुंह में मजदूरी और प्रशासन को नजर नहीं आती मुफलिसी की मजबूरी।

बुंदेलखंड में मौरम-पहाड़ खदानों में लिखी जा रही मजदूरों की मौत पर इबारत।

श्रमिक का नही होता श्रम विभाग में बीमा,मस्टरोल भरकर यदि लगे मजदूर तो रहता दबाव लेकिन जानबूझकर खनिज एक्ट और मजदूर लेबर एक्ट का हो रहा बुंदेलखंड में उल्लंघन।

बाँदा। बाँदा में मजदूरों की कब्रगाह बनती मौरम खदान इन दिनों सुर्खियों में है। बालू खदान में गहरे गड्ढों पर डूबकर मौत या फिर संदिग्ध मौत सामान्य घटनाक्रम बन रहा है। पूरे सिस्टम को साधकर यह खेल मौरम खदान में होता हैं। मजबूर आदमी की कोई तहरीर नहीं,दबाव में लेकर मुंह बंद करने को रुपया ठूसने की हनक से यहां समझौता होता हैं। पीएम रिपोर्ट में डॉक्टर को साध लिया बांकी दो-तीन दिन बाद फिर वही पोकलैंड से अवैध खनन ढर्रा शुरू हो जाता हैं।

आज रविवार को थाना मटौंध के मरौली खँड 3 मेसर्स केएस एंड माइन्स में ओमप्रकाश नाम के मजदूर की नदी में डूबने से मौत होने की जानकारी हैं। मजदूर नदी में कैसे डूबा यह जांच का विषय हैं। उधर जांच करेगा कौन जब पूरी व्यवस्था ही रुपयों में बंधक हैं। मुख्यमंत्री तक बात नहीं पहुंचे इसके लिए मीडिया को चुप रखो। अलबत्ता इस पर बात करना इसलिए बेमानी हैं कि गरीबी क्षेत्र का लाभ उठाकर खनन संपदा का बेतरतीब दोहन यहां की नियति बन चुकी हैं।

Banda: Death of a worker by drowning in Marauli Mauram mine section 3 KS & Mines

बुंदेलखंड में दो तरह के लोग है पहला बरेदी और दूसरा पढ़ालिखा मूर्ख आदमी। बरेदी से अर्थ हूटर वाले दबंग या मौरम ठेकेदार या नेता से है। वहीं जनता उसकी चाबुक और त्वरित लाभ के झुनझुने पर मंत्रमुग्ध होकर अपनी जन्मभूमि का विनाश कराने में पीछे नहीं हैं। लाभ भी कई किस्मों के हैं। मौरम माफिया जनसेवक हैं, नेता है और माननीय भी हैं। जनता मजदूर हैं, मुलाजिम हैं और अवसरवादी भी हैं। खैर आज ओमप्रकाश की असमय मौत और बीते दिनों अन्य मजदूरों की मौतों ने ब्यूरोक्रेसी के साथ पर्यावरण कानून का अनुपालन करवाने वाली ज़िम्मेदार सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया है। देखना यह हैं इनकी बेशर्मी किस हद तक बेपरवाह,बेलगाम होती हैं।

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