क्या कहता है चार राज्यो में हुए चुनाव का समीकरण, 2 मई को आएगा बहुचर्चित चुनावों का रिजल्ट

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मेरा मानना है कि 2 मई को आने वाले चार राज्यों पश्चिम बंगाल,असम,केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के चुनावी नतीजे चौकाने वाले होंगे और देश की राजनीति में नए समीकरण का सूत्रपात करेंगे।मेरा अनुमान है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी सत्ता हासिल कर लेगी।

 

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यहां 40 फीसदी वोट मिले थे जिसमें इस बार बढ़ोत्तरी हुई है।2011 और 2016 में ममता की जीत का आधार रहा मतुआ और मुसलमान वोटर उनसे छिटका है।सीएए ने बीजेपी के लिए यहां टॉनिक का काम किया है।वाम और कांग्रेस का मोर्चा यहां लड़ाई में ही नजर नहीं आएगा।2019 के लोकसभा चुनाव में भी इनका खाता नहीं खुला था।असम में बीजेपी विकट स्थिति में जरूर है।

 

वजह है यहां एक ओर सात दलों का गठबंधन उसके खिलाफ है।इसमें बदरुद्देन अजमल की एआईयूडीएफ और सीएए का विरोध करने वाले जनजातीय दल भी शामिल हैं।ऐसे में के नतीजों पर मुझे कुछ असमंजस है लेकिन बीजेपी के खिलाफ यहां मुसलमानों के एकजुट होने के बाद आखिरी दौर में हिन्दू वोटर भी जबरदस्त एक हुए हैं।खासकर बांग्लादेशी घुसपैठियों के संरक्षक बदरुद्दीन अजमल को साथ लेने से कांग्रेस का परम्परागत वोटर भी उससे छिटका है।इसके बावजूद यहां कांग्रेस और उसके गठबंधन के साथ मुझे बीजेपी नेक टू नेक की लड़ाई में दिख रही है।बात केरल की करें तो यहां लड़ाई एलडीएफ और यूडीएफ के बीच ही है लेकिन बीजेपी यहां तीसरी ताकत बनकर उभरेगी इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

 

दशकों तक यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मेहनत का नतीजा इस चुनाव में दिख सकता है। बीजेपी यहां पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सीटें भले ही न हासिल कर पाई हो लेकिन उसका वोट बैंक लगातार बढ़ा है।एक साल पहले ही हुए निकाय चुनाव में बीजेपी सत्रह फीसदी से अधिक वोट हासिल कर यहां अपनी मजबूत मौजूदगी दिखा चुकी है।हालांकि केरल की 45 फीसदी से अधिक आबादी मुसलमानों और ईसाईयों की है लेकिन हिन्दू वोटों में मजबूत पैठ बनाने के स्स्थ बीजेपी ईसाईयों को ये विश्वास दिलाने में कामयाब रही है कि मुसलमानों के जिहादी उन्माद को वही ठिकाने लगा सकती है।शायद यही वजह रही है कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की सबसे अधिक सभाएं इसी इलाके में हुई हैं।बीजेपी ने यहां सात चर्चों के बीच छह दशक से अधिक समय से चल रहे विवाद को सुलझाने का पांसा चलकर भी ईसाई वोटों पर बैठ बनाने की कोशिश की है।तमिलनाडु और पुडुचेरी में बीजेपी सीमित सीटों पर एआईडीएमके के साथ सधे कदम के साथ चुनाव मैदान में है।

 

केरल की तरह यहां भी बीजेपी ने उन समुदायों को अपने पाले में लाने की कोशिश की है जिन्हें अब तक किसी दल ने आपेक्षित महत्व नहीं दिया। संसद में कानून लाकर सात समुदायों को मिलाकर एक जाति का दर्जा देने जैसे कदम उठाकर उसने यहां इन वर्गों में अपनी पैठ बनाई है।साथ ही उसका फोकस यहां के हिंदी भाषी,उत्तर भारतीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर रुचि रखने वाले युवा वोटरों पर रहा है।मेरा मानना है कि तमिलनाडु और पुडुचेरी में एआईडीएमके सत्ता में आएगी और बीजेपी उसकी आंशिक साझीदार होगी।एक बात और इन पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के साथ केन्द्र की राजनीति में उथल पुथल मचना तय है।कांग्रेस में राहुल गांधी के विरोध में फूट रहे वरिष्ठ और स्वाभिमानी नेताओं के सुर और मुखर हो सकते हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बनने वाले एनडीए विरोधी गठबंधन की कमान राहुल सोनिया की जगह शरद पवार,ममता बनर्जी जैसे किसी गैर कांग्रेसी नेता के साथ आ सकती है।कांग्रेस के बड़े नेताओं के साथ यूपीए के सहयोगी दल भी राहुल का नेतृत्व मानने से इनकार कर सकते हैं और सोनिया तो सक्रिय राजनीति से लगभग दूर ही हो चुकी हैं

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